हम अंदर ही अंदर सुलगते रहे, फिर भी हमें देखकर लोग जलते रहे!
क्योंकि दुखडे सुनाने की आदत न थी!!
वैसे दुश्मन किसी को बनाया नहीं, लेकिन दोस्तों ने कमी वो भी खलने न दी!
क्योंकि झूठी तारीफें करने की आदत न थी!!
सीढी बने हम और चढाया जिन्हें, चिढाकर हमें वो भी चलते बने!
क्योंकि बदला चुकाने की आदत न थी!!
खुद बिखरते रहे,खुद सिमटते रहे, सब सिसकियों पर ठहाके लगाते रहे!
क्योंकि हमें गिडगिडाने की आदत न थी!!
बस दिया ही दिया,कुछ लिया न कभी, पर लेने वाले भी आंखें दिखाते रहे!
क्योंकि हमें दिल दुखाने की आदत न थी!!........!!!!!!!!! :)


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